श्री गौतम राजरिशी एक संवेदनशील चिट्ठाकार के साथ-साथ हिंदी ग़ज़लों के सशक्त हस्ताक्षर भी हैं .इनका जन्म 10 मार्च 1976 को सहरसा, बिहार में हुआ . प्रारंभिक शिक्षा गृह-नगर सहरसा(बिहार) में। इंटरमिडियेट के बाद राष्ट्रीय रक्षा अकादमी(NDA),पुने में तीन साल का और भारतीय सैन्य अकादमी(IMA), देहरादून में एक साल के सैन्य-प्रशिक्षण के पश्चात भारतीय सेना की पैदल-वाहिनी खंड(infantry) में लेफ्टिनेंट पद पर कमीशन। फिलहाल मेजर रैंक पे कश्मीर के अंदरूनी आतंकवाद ग्रस्त इलाके में पदस्थापित। कविताओं-गज़लों और हिंदी साहित्य का शौक बचपन से। कई ग़ज़लें हंस, वागर्थ, कादंबिनी, कथन, लफ़्ज़, वर्तमान साहित्य, शेष, प्रयास, काव्या, आधारशिला, नई ग़ज़ल आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित। प्रस्तुत है इनकी दो प्यारी सी गज़लें -




(.)

परों का जब कभी तूफान से यूं सामना निकला
कि कितने ही परिंदों का हवा में बचपना निकला

जाने कह दिया क्या धूप से दरिया ने इतरा के
कि पानी का हर इक कतरा उजाले में छना निकला

जरा खिड़की से छन कर चांद जब कमरे तलक पहुँचा
दिवारों पर तेरी यादों का इक जंगल घना निकला

गली के मोड़ तक तो संग ही दौड़े थे हम अक्सर
मिली चौड़ी सड़क जब,अजनबी वो क्यूं बना निकला

दिखे जो चंद अपने ही खड़े दुश्मन के खेमे में
नसों में दौड़ते-फिरते लहू का खौलना निकला

मसीहा-सा बना फिरता था जो इक हुक्मरां अपना
मुखौटा जब हटा,वो कातिलों का सरगना निकला

चिता की अग्नि ने बढ़कर छुआ था आसमां को जब
धुँयें ने दी सलामी,पर तिरंगा अनमना निकला

(.)

वो जब अपनी खबर दे है
जहाँ भर का असर दे है

चुराकर कौन सूरज से
ये चंदा को नजर दे है

है मेरी प्यास का रूतबा
जो दरिया में लहर दे है

कहाँ है जख्म मालिक
यहाँ मरहम किधर दे है

रगों में गश्त कुछ दिन से
कोई आठों पहर दे है

जरा-सा मुस्कुरा कर वो
नयी मुझको उमर दे है

रदीफ़ो-काफ़िया निखरे
गजल जब से बहर दे है

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4 comments:

वीनस केसरी ने कहा… 26 अप्रैल 2010 को 4:51 pm

परों का जब कभी तूफान से यूं सामना निकला
कि कितने ही परिंदों का हवा में बचपना निकला

ये तो गौतम जी की हजज में मेरी पसंदीदा गजल है

दूसरी गजल भी उम्दा है

मकता तो बहुत मजेदार है

रदीफ़ो-काफ़िया निखरे
गजल जब से बहर दे है

पढ़ कर अपना एक मकता याद आ गया

हम तो वीनस काफिये में ही उलझ कर रह गये
वो बहर के साथ गाता है बताओ क्या करूँ

गौतम जी ये आपके लिए ही लिखा था अब पता चला :)

रश्मि प्रभा... ने कहा… 26 अप्रैल 2010 को 8:51 pm

न जाने कह दिया क्या धूप से दरिया ने इतरा के
कि पानी का हर इक कतरा उजाले में छना निकला
........
धूप से इतरा के कहा दरिया ने
वीरों की कलम में दिल ही दिल बहते हैं

Himanshu Pandey ने कहा… 27 अप्रैल 2010 को 9:56 am

गौतम जी की यह गज़लें उत्सव को एक अलग ही रंग देती हैं !
उत्सव का उत्कृष्टतम स्वरूप निखर कर आ रहा है इन गज़लों के साथ !
रवानी देखिए इनकी ! मन-मिजाज सब इनके हवाले करने का जी चाहता है !
कुछ शख्सियत भी है ऐसी गौतम जी की गज़लें बहने लगती हैं तरन्नुम से, हम पीने लगते हैं !

आस्वादन पहली शर्त है, किसी रचना की सफलता के लिए ! ग्राह्यता कितनी है उसमें !
हम जैसे गज़ल के बहरो-वज़न को न जानने वाले भी इनकी सुघड़ता पर ठगे रह जाते हैं !

आभार इनकी प्रस्तुति के लिए !

shyam gupta ने कहा… 14 अप्रैल 2014 को 6:44 pm

परों का जब कभी तूफान से यूं सामना निकला
कि कितने ही परिंदों का हवा में बचपना निकला

---ग़ज़ल तो ठीक है परन्तु ये सामना निकला ...बचपना निकला किस भाषा के शब्द हैं ...निकला शब्द का क्या अर्थ निकला है यहाँ ..

---सिर्फ ग़ज़ल ही तकनीक में पुष्ट होना आवश्यक नहीं अपितु अर्थ-प्रतीति एवं शब्दों के अर्थ स्पष्ट होनी चाहिए ...अन्यथा क्या अर्थ है ग़ज़ल कहने का ...

 
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