राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर रश्मि रवीजा जी वेहद संवेदनशील कथाकार के साथ-साथ हिन्दी की समर्पित चिट्ठाकार भी हैं . विगत दिनों इनकी श्रेष्ठ कथा यात्रा के लिए संवाद सम्मान से सम्मानित हैं . अपने बारे में रश्मि जी कहती हैं कि "पढने का शौक तो बचपन से ही था। कॉलेज तक का सफ़र तय करते करते लिखने का शौक भी हो गया. 'धर्मयुग',' साप्ताहिक हिन्दुस्तान', 'मनोरमा ' वगैरह में रचनाएँ छपने भी लगीं .पर जल्द ही घर गृहस्थी में उलझ गयी और लिखना,पेंटिंग करना सब 'स्वान्तः सुखाय' ही रह गया . जिम्मेवारियों से थोडी राहत मिली तो फिर से लेखन की दुनिया में लौटने की ख्वाहिश जगी.मुंबई आकाशवाणी से कहानियां और वार्ताएं प्रसारित होती हैं..यही कहूँगी "मंजिल मिले ना मिले , ये ग़म नहीं मंजिल की जुस्तजू में, मेरा कारवां तो है" प्रस्तुत है इनकी कहानी -

!! कशमकश !!
() रश्मि रविजा 


आँखें खुलीं तो पाया आँगन में चटकीली धुप फैली है.हडबडाकर खाट से तकरीबन कूद ही पड़ा.लेकिन दुसरे ही क्षण लस्त हो फिर बैठ गया.कहाँ जाना है उसे?,किस चीज़ की जल्दबाजी है भला? आठ के बदले ग्यारह बजे भी बिस्तर छोडे तो क्या फर्क पड़ जायेगा? पूरे तीन वर्षों से बेकार बैठा आदमी. अपने प्रति मन वितृष्णा से भर उठा.डर कर माँ की ओर देखा,शायद कुछ कहें, लेकिन माँ पूर्ववत चूल्हे में फूँक मारती जा रहीं थीं और आंसू तथा पसीने से तरबतर चेहरा पोंछती जा रहीं थीं .यही पहले वाली माँ होती तो उसे उठाने की हरचंद कोशिश कर गयीं होतीं और वह अनसुना कर करवटें बदलता रहता.लेकिन अब माँ भी जानती है कौन सी पढाई करनी है उसे और पढ़कर ही कौन सा तीर मार लिया उसने? शायद इसीलिए छोटे भाइयों को डांटती तो जरूर हैं पर वैसी बेचैनी नहीं रहती उनके शब्दों में.

थोडी देर तक घर का जायजा लेता रहा.आँगन में नीलू जूठे बर्तन धो रही थी.जब जब नीलू को यों घर के कामो में उलझे देखता है एक अपराधबोध से भर उठता है.आज जो नीलू की उंगलियाँ स्याही के बदले राख से सनी थीं और हाथों में कलम की जगह जूठे बर्तन थामे थे उसकी वजह वह ही था.. एक ही समय उसे भी फीस के लिए पैसे चाहिए थे और नीलू को भी.(वरना उसका नाम कट जाता) उसी महीने लोकमर्यादा निभाते दो दो शादियाँ भी निपटानी पड़ी थीं.एक ही साथ इतने सारे खर्चों का बोझ ,पिता के दुर्बल कंधे सँभालने में असमर्थ थे.और नीलू की पढाई छुडा दी गयी.प्राइवेट परीक्षाएं दो.बुरा तो उसे बहुत लगा था पर सबके साथ साथ उसके मन में भी आशा की एक किरण थी कि उसका तो यह अंतिम वर्ष है.अगले वर्ष वह खुद अपने पैरों पे खडा हो सकेगा और नीलू की छूटी पढाई दुबारा जारी करवा सकेगा.किन्तु उस दिन को आज तीन साल बीत गए और ना तो वह ऑफिस जा सका ना नीलू स्कूल.

जबकि पिता बदस्तूर राय क्लिनिक से सदर हॉस्पिटल और वहां से आशा नरसिंघ होम का चक्कर लगाते रहें. सोचा था नौकरी लगने के बाद पहला काम अपने पिता की ओवरटाइम ड्यूटी छुड़वाने की करेगा.पर ऐसे ही जाने कितने सारे मनसूबे अकाल मृत्यु को प्राप्त होते चले गए और वह निरुपाए खडा देखते रहने के सिवा कुछ नहीं कर सका.क्या क्रूर मजाक है? स्वस्थ युवा बेटा तो दिन भर खाट तोड़ता रहें और गठिया से पीड़ित पिता अपने दुखते जोडों सहित सड़कें नापते रहें.जब जब रात के दस बजे पिता के थके क़दमों की आहट सुनता है, मन अपार ग्लानि से भर उठता है,जी करता है --काश आज बस सोये तो सोया ही रह जाए. पर यहाँ तो मांगे मौत भी नहीं मिलती.कई बार आत्महत्या के विचार ने भी सर उठाया लेकिन फिर रुक जाता है. जी कर तो कोई सुख दे नहीं पा रहा. मर कर ही कौन सा अहसान कर जाएगा? बल्कि उल्टे समाज के सिपहसलारों के व्यंग्बानो से बींधते रहने को अकेला छोड़ जायेगा अपने निरीह माता पिता .

सारी मुसीबत इनकी निरीहता को लेकर ही है. क्यूँ नहीं ये लोग भी उपेक्षा भरा व्यवहार अपनाते? क्यूँ इनकी निगाहें इतनी सहानुभूति भरी हैं? क्यूँ नहीं ये लोग भी औरों की तरह उसके यूँ निठल्ले बैठे रहने पर चीखते चिल्लाते..क्यूँ नहीं पिता कहते कि वह अब इस लायक हो गया है की अपना पेट खुद पाल सके,कब तक उसका खर्च उठाते रहेंगे?..क्यूँ नहीं माँ कहती कि 'रमेश,विपुल,अभय सब अपनी अपनी नौकरी पर गए,वह कब तक बैठा रोटियां तोड़ता रहेगा?'...क्यूँ नहीं कोई काम बताने पर नीलू पलट कर कहती 'क्या इसलिए पढाई छुडा घर बैठा दिया था कि जब चाहो काम करवा सको.'..पर ये लोग ऐसा कुछ नहीं कहते बल्कि उसके दुःख को अपना दुःख समझ दुखी हो जाते हैं.पूरे समय सिर्फ यही कोशिश करते हैं कि भूले से भी उसे अपनी बेरोजगारी का भान न हो.

पर दुनिया उसके घर वालों की तरह तो नहीं... नुक्कड़ के बनवारी चाचा हों या कलावती मौसी, नज़र पड़ते ही एक ही सवाल..कहीं कुछ काम बना?घर से निकलने का मन ही नहीं होता...और आजकल तो निकलना और भी दूभर क्यूंकि रूपा मायके आयी हुई थी वही रूपा जिसके साथ जीने मरने की कसमे खाई थीं. रूपा में तो बहुत हिम्मत थी....इंतज़ार करने... साथ भाग तक चलने को तैयार थी. पर वही पीछे हट गया ,कोई फिल्म के हीरो हेरोईन तो नहीं थे दोनों कि जंगल में वह लकडियाँ काट कर लाता और सजी धजी रूपा उसके लिए खाना बनाती. रूपा की शादी हो गयी ,एक नन्हा मुन्ना भी गोद में आ गया, कई मौसम बदल गए पर नहीं बदला रूपा की आँखों का खूनी रंग...आज भी कभी उसपे नज़र पड़ जाए तो रूपा की आँखे अंगारे उगलने लगती हैं.

शुक्र है, उसे हर तरफ से नकारा पाकर भी माँ पिता की आँखे प्यार से उतनी ही लबरेज रहती हैं.हर बार कोई नया फार्म या परीक्षा देने के लिए राह खर्च मांगते समय कट कर रह जाता है पर पिता उतने ही प्यार से पूछते हैं. "कितने चाहिए." और दस पांच ऊपर से पकडा देते हैं "रख लो जरूरत वक़्त काम आएंगे "..वह तो तंग आ चुका है इंटरव्यू देते देते. लेकिन इंटरव्यू का नाम सुनते ही परिवार में उछाह उमंग की एक लहर सी दौड़ जाती है. नीलू दरवाजे के पास पानी भरी बाल्टी रख देती है.नमन भागकर हलवाई के यहाँ से दही ले आता है.माँ टीका करती हैं. पिता बार बार दुहराते हैं.सामन का ध्यान रखना.चलती ट्रेन में भूलकर भी न चढ़ना.जैसे वह अब भी कोई छोटा सा बच्चा हो.

पर वह इन सारे हथियारों से लैस होकर जाता है और हथियार डालकर चला आता है. पता चलता है ,चुनाव तो पहले ही कर लिया गया था.इंटरव्यू तो मात्र एक दिखावा था.परिवारजनों की आँखों में जलती आशा ,अपेक्षा की लौ दप से बुझ जाती है.
नहीं अब और नहीं ..इन सारी स्थितियों का अंत करना ही होगा.अब घर में तभी बताएगा जब पहला वेतन लाकर माँ के हाथों पे रख देगा.
ट्यूशन लेकर लौटा तो नीलू की जगह माँ ने खाना परोसा.और देर तक वहीँ बैठीं रहीं तो लगा कुछ कहना चाहती हैं.खुद ही पूछ लिया --"क्या बात है,माँ?"
"नहीं ...बात क्या होगी "...माँ कुछ अटकती हुई सी बोल रही थीं..."अगले हफ्ते से नीलू के दसवीं के इम्तहान हैं. सेंटर दूसरे शहर पड़ा है.रहने की तो कोई समस्या नहीं,चाचाजी वहां हैं ही पर लेकर कौन जाए?.पिताजी को छुट्टी मिलेगी नहीं...मैं साथ चली भी जाऊं पर वहां नीलू को एक्जाम सेंटर रोज लेकर कौन जायेगा...मेरे लिए वो शहर नया है...तेरा कोई इम्तिहान

तो नहीं ...तू जा सकता है?"

वह तो माँ के पूछने के पहले ही खुद को प्रस्तुत कर देना चाहता था ,पर एक समस्या थी...उसके एक दोस्त ने एक जगह नौकरी के लिए बात की थी और अगले हफ्ते ही उनलोगों ने बुलाया था...दोस्त ने पूरा दिलासा दिया था कि..यहाँ जरूर बात बन जायेगी.उसके चाचा की अच्छी पहचान थी यहाँ...पर अब क्या करे...बता देगा तो फिर वही अपेक्षाएं ,आशाएं सर उठाने लगेंगी जिनसे बचना चाह रहा था..और नीलू के भी बोर्ड के इम्तहान हैं .पहले ही उसकी वजह से वह तीन साल से स्कूल छोड़ घर बैठी हुई थी. तय कर लिया कुछ नहीं बतायेगा माँ की आँखे उसपर टिकी थीं.बोला--"चिंता मत करो माँ, मैं लेकर जाऊंगा "
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7 comments:

sangita puri ने कहा… 30 अप्रैल 2010 को 3:20 pm

किसी बात के लिए गंभीर होने पर .. जीवन में अक्‍सर दो काम एक साथ उपस्थित हो जाते हैं .. और ऐसे ही कशम कश में जीवन चलता रहता है .. बहुत सुंदर कहानी है .. रश्मि रविजा जी को बधाई और आपको धन्‍यवाद !!

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा… 30 अप्रैल 2010 को 4:00 pm

Shandaar Kahani. Haardik Badhaayi.

रश्मि प्रभा... ने कहा… 30 अप्रैल 2010 को 4:01 pm

रश्मि जी की कहानियों में जीवन दर्शन साफ़ झलकता है

mala ने कहा… 30 अप्रैल 2010 को 7:51 pm

यह उत्सव उस सोपान को प्राप्त कर लिया हैं जहां हर किसी की परिकल्पना नहीं पहुँचती है .....शुभकामनाओं के साथ !

Himanshu Pandey ने कहा… 1 मई 2010 को 10:31 am

रश्मि जी की कहानियाँ सदैव ही ब्लॉगजगत में प्रशंसनीय और समादृत रही हैं ! कहानियों का सधा प्रस्तुतिकरण इन्हें महत्वपूर्ण और पठनीय बनाता है ।

रश्मि जी की इस कहानी का आभार ।

rashmi ravija ने कहा… 1 मई 2010 को 12:36 pm

संगीता जी, जाकिर जी,रश्मि जी, माला एवं हिमांशु जी...बहुत बहुत शुक्रिया...

वाणी गीत ने कहा… 1 मई 2010 को 2:08 pm

रश्मि की कहानी ही क्या हर विधा जचती है मुझे ...
परिकल्पना उत्सव की सफल प्रस्तुति ...!

 
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