शिखा वार्ष्णेय का नाम हिंदी चिट्ठाकारी में बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है , इनका ब्लॉग स्पंदन की चर्चा परिकल्पना ब्लॉग विश्लेषण में भी हो चुकी है और इन्हें अभी हाल में हिंदी चिट्ठाकारी में सकारात्मक योगदान के लिए संवाद सम्मान से नवाजा गया है .इन्होने मास्को  स्टेट  यूनिवर्सिटी  से गोल्ड मैडल के साथ टी.वी. जर्नलिज्म   में मास्टर्स करने के बाद कुछ समय एक टीवी चेनेंल में न्यूज़ प्रोड्यूसर के तौर पर काम किया ,इन्हें हिंदी भाषा के साथ ही अंग्रेजी ,और रुसी भाषा पर भी समान अधिकार है परन्तु खास लगाव अपनी मातृभाषा से ही है.वर्तमान में लन्दन में रहकर इनका स्वतंत्र लेखन जारी है. प्रस्तुत है इनका एक संस्मरण-

!! वेनिस की एक शाम !!
() शिखा वार्ष्णेय



बहुत साल पहले एक फिल्म आई थी " द ग्रेट गेम्बलर " उसमें अमिताभ बच्चन और जीनत अमान पर एक गाना फिल्माया गया था ...." दो लफ़्ज़ों की है दिल की कहानी " वेनिस में गंडोले (एक तरह की लम्बी नोंक वाली नाव जिसे नाविक उसके पिछले छोर पर खड़ा होकर चलाता है ) पर फिल्माए इस गीत ने बचपन में ही मुझे वेनिस से प्यार करा दिया था ... जिस उम्र में बच्चे "डिजनी वर्ल्ड " जाने का सपना देखते हैं ,वहां मैने वेनिस जाने की कल्पना कर डाली थी ,मन ही मन सोच लिया था कि वहाँ उस गंडोला वाले को यही गाना .." ओ मोरे मिओ (गाने की पहली पंक्ति जो इटालियन भाषा में है ) गाने को कहूँगी..तब किसने सोचा था कि जिन्दगी ये मौका भी देगी...हम तो ये सोच कर भूल गए कि "न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी" पर कहते हैं न कि सपने जरुर देखने चाहिए तभी हम उनके पूरा होने की उम्मीद कर सकते हैं ...तो जी वो दिन भी आया जब हम अपने सपनों के इस शहर में खड़े थे और उसे उस फिल्म के दृश्य से मिलाने की कोशिश कर रहे थे. [Photo]A Museum in Venice उत्तरी इटली का एक छोटा सा शहर वेनिस- जिसकी खूबसूरती किसी हसीन पेंटिंग की तरह लगती है, कल्पना से कोसों दूर.... हम कहाँ ये सोच सकते हैं कि कोई शहर ऐसा भी है जहाँ सड़क ही नहीं है ....पानी है सिर्फ पानी ........खुबसूरत कनाल बिछी हुई हैं पूरे शहर में ,जब सड़क ही नहीं है तो उस पर चलने वाले वाहन कहाँ से आयेंगे सो कोई कार ,बस, रेल यहाँ तक कि स्कूटर या बाइक का नमो निशान नहीं दीखता.अजीब शहर है सारी सुविधाएँ है जैसे - टैक्सी ,बस. पर सब पानी में चलती है .( वाटर टैक्सी ,वाटर बस ) आपको कहीं भी जाना है शहर में, यही एक मात्र साधन हैं आपके पास या फिर पैदल चलिए.कहीं परियों के देश सा कुछ एहसास होने लगता है ...


ये शहर इस दुनिया का तो नहीं लगता ... वैसे होने को तो ये शहर सांकृतिक और व्यापारिक केंद्र है ..साल भर सेलानियों को लुभाने के लिए बहुत से कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं यहाँ ...क्रिसमस पर होने वाला कार्निवाल तो दुनिया भर में प्रसिद्ध है जिसमे खुबसूरत मास्क पहन कर लोग निकलते हैं ,और इन मास्क की फैक्ट्री और दुकानों की भव्यता देख कर गश आने लगता है. बहुत से संग्रहालय और आर्ट गैलरियां हैं .और .बहुत ही खुबसूरत ग्लास फैक्टरी है जहाँ जाकर हमें एहसास हुआ कि हमारे भारत के लोग कितने अमीर हैं ...क्योंकि वहाँ के एक दुकान दार ने बताया कि उनके यहाँ से ६०% माल भारत के लिए निर्यात किया जाता है..खैर इन सब को छोडिये ... मुझे जो वेनिस की २ चीज़ें बहुत पसंद आईं वो हैं ...एक तो शहर की बनावट .....लम्बी लम्बी पानी की कनाले उन पर चलती हुई मोटर बोट ,शहर की छोटी छोटी पानी की गलियों से जाते हुए गंडोले ...किसी काल्पनिक लोक में होने का सा एहसास देते है ..एक सपनों का शहर जहाँ की हवाओं में प्यार है , फिजाओं में रोमांस है..उसपर गंडोला की दिलकश यात्रा..हालाँकि अपने बचपन के उस सपने को पूरा करने के लिए मुझे काफी मशक्कत करनी पड़ी ..क्योंकि वेनिस यूरोप का सबसे महंगा शहर है ,और ये वहाँ काम करने वाले लोग बड़े फक्र से आपको जताते हैं कि साहेब ! पैसे बचाने थे तो वेनिस क्यों आये?.तो जी गंडोला की एक ट्रिप का दाम था £१०० और ये सुन कर हमारी सांस कुछ अटक सी गई थी ...पर फिर हिम्मत बांधी और अपना हिन्दुस्तानी रास्ता , आजमाया . थोड़ी बहुत मेहनत गंडोला वाले से मोल भाव करने में लगी और थोड़ी पतिदेव को इमोशनल बलेक मेल करने में ...आखिरकार £80 में दोनों मान गए और हम चढ़ गए गंडोले पर ...हाँ यहाँ ये बताती चलूँ कि उसपर चढते ही हमने अपनी फ़रमाइश रख दी गंडोले वाले से कि गाना सुनाओ ...वो और भी झक्की था कहने लगा जी ये तो पुरानी बात हो गई अब कोई नहीं गाता . न ही किसी को वो लोकगीत अब आते हैं ..


.हमने कहा अरे इतने पैसे दिए हैं गाना तो हम सुनकर जायेंगे और दूसरी नाव वाला भी तो गा रहा है तुम्हें क्या गुरेज़ है .लोकगीत नहीं तो कुछ भी सुना दो ...और वो हँसा ठहाका लगा कर कि जी आपको क्या पता वो क्या गा रहा है ? वो तो हमें पता है टीपिकल इतालियन में गलियां दे रहा है अब सकपकाने की बारी हमारी थी...पर बचपन का सपना था तो छोड़ने वाले तो थे नहीं हम, उसे वही दो लाइन ओ मोरे मिओ" बताई और कहा ये ही गाओ बार बार ..हमारी जिद देख आखिर उसने २ लाइन सुना ही दीं और हमारे पैसे वसूल हो गए पूरे ट्रिप के दौरान उसने हमें बड़े बड़े लोगों के घर दिखाए ..जैसे लेओनार्दो डी विन्ची का घर ,.....एक बात जो वहाँ जगह जगह पर अचंभित करती है वो ये कि आपके घर की खिड़की हो या दरवाजा पानी में ही खुलता है...घर से निकले तो नीचे पानी .आपके स्कूटर या कार की जगह खड़ी है नाव... बैठिये और चल पडिये ..फिर रैस्टोरेंट जाना हो या राशन की दुकान उसी से जाना होगा....हाँ रैस्टोरेंट से याद आया ..दूसरी चीज़ जो वहां हमें बहुत पसंद आई वो थी वनेशियन खाना ..उफ़ ....वहां जाकर हम मांसाहारी से शाकाहारी बन गए थे ...वो कहते हैं न ..when there is so much to eat why eat meat ? .पिज्जा और पास्ता की इतनी vairity मैने और दुनिया में कहीं नहीं देखी वो भी शाकाहारी ....खैर इससे पहले की मेरे मुँह में फिर से पानी आये आगे बढ़ते हैं ..वहाँ की जल गलियों में घूम घूम कर मन ही नहीं भर रहा था... हाँ बाकी के लोगों को रात तक पानी से उकताहट सी होने लगी थी ...और हमारे बच्चों को ठहरे हुए पानी की वजह से कहीं कहीं बदबू का भी आभास होने लगा था ..पर जैसे हमारा तो कोई पिछले जनम का नाता था वेनिस से . तो हमने एलान कर दिया कि रात की छटा देखे बिना हम तो हिलेंगे भी नहीं...और जी हमारा निर्णय व्यर्थ नहीं गया पानी में तैरता वो शहर ,चाँदनी और नावों की चलती रौशनी में कैसा लगता है इसका बखान तो मैं शब्दों में कर ही नहीं पाऊँगी ...हाँ इतना जरुर कह सकती हूँ कि ये शहर की खूबसूरती, किसी की भी कल्पना से परे है. फिर भी मैं कुछ पंक्तियों में उसे समेटने की कोशिश करती हूँ.

पानी ही पानी वहाँ तक

नजरें जाती हैं जहाँ तक

प्रीत भरी हवा में देखो

रूह हो जाती मस्त जहाँ पर

जल में बहता एक गाँव सा

सुंदर नावों के पांव सा.

तन मन जहाँ प्रफुल्लित हो

कैसे भूलें वो दिन रात.

वेनिस की वो सुरमई शाम



() () ()

15 comments:

rashmi ravija ने कहा… 12 मई 2010 को 12:50 pm

शिखा के साथ हमने भी घूम लिया वेनिस...बहुत ही रोचक ढंग से अच्छी जानकारी दी है..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 12 मई 2010 को 12:55 pm

कितनी खूबसूरती से लिखा है संस्मरण कि लगता है कि हम स्वयं ही घूम रहे हों....चलिए शिखा की नज़र से हमने भी देख ली वेनिस की एक शाम... :):)

बहुत बढ़िया संस्मरण

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा… 12 मई 2010 को 1:17 pm

आपके बहाने हमने भी वेनिस का नजारा ले लिया। शुक्रिया जी शुक्रिया।
--------
बूझ सको तो बूझो- कौन है चर्चित ब्लॉगर?
पत्नियों को मिले नार्को टेस्ट का अधिकार?

रश्मि प्रभा... ने कहा… 12 मई 2010 को 1:25 pm

अब तो मैं भी नहीं भूल पाऊँगी वेनिस की खूबसूरत शाम

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा… 12 मई 2010 को 1:32 pm

लेओनार्दो डी विन्ची का शहर वेनिस,
पानी नहर नाव का शहर वेनिस
आपके साथ घुम लिए।
वैसे काफ़ी खुबसूरत हैं यहां कि शिल्पकारी

आपका आभार

रेखा श्रीवास्तव ने कहा… 12 मई 2010 को 1:56 pm

बस इसी लिए तो तुम्हारे दूर दराज बैठे होने का फायदा हम लोगों को हो रहा है , यही बैठे बैठे वेनिस घूम लिए. बहुत सजीव वर्णन किया है तुमने. हम तो बस कल्पना में ही तुम्हारे घोमाने का आनंद उठा रहे हैं. इस यात्राको कराने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

Unknown ने कहा… 12 मई 2010 को 2:27 pm

jinti sunder venis laga usse bhi sundder aapki ye abhivyakti lagi shikha ji ...............

aur kavita ne iss abhivyakti mein jaan daal di ..... badhayee ho shikha ji

ashish ने कहा… 12 मई 2010 को 6:37 pm

venice looks as beautiful as roman godess venus. hmmm this comparison reminds me of a old movie VENUS OF VENICE. KASH MAI RAHUL SANKRITYAYAN HOTA.

Udan Tashtari ने कहा… 12 मई 2010 को 10:16 pm

पुनः पढ़ना भी बहुत अच्छा लगा.


एक विनम्र अपील:

कृपया किसी के प्रति कोई गलत धारणा न बनायें. विवादकर्ता की कुछ मजबूरियाँ होंगी, उन्हें क्षमा करते हुए अपने आसपास उठ रहे विवादों को नजर अंदाज कर निस्वार्थ हिन्दी की सेवा करते रहें, यही समय की मांग है.

हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में आपका योगदान अनुकरणीय है, साधुवाद एवं अनेक शुभकामनाएँ.

-समीर लाल ’समीर’

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा… 12 मई 2010 को 11:42 pm

shikha ji ne aaj fir se venice ghumaa diya, aur aaj dobara ghoom kar fir bahut maza aaya. bahut dhanyawaad shikha ji.

विजय तिवारी " किसलय " ने कहा… 13 मई 2010 को 9:17 am

अति सुन्दर
- विजय

Abha Khetarpal ने कहा… 13 मई 2010 को 8:30 pm

Vince itni sunder jagah hai ki UNESCO ne isay world heritage site ghoshit kiya hai.Tumhare varnan ne to isay aur bhi khoobsurat bana diya hai....

good work....

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा… 21 मई 2010 को 1:40 pm

Venis ki yatra k liye dhanyawad.....:)

"Venis ki wo surami shaam.....!"

yahan bhi dastak den
www.jindagikeerahen.blogspot.com
.
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_7945.html

janta ki khoj ने कहा… 11 सितंबर 2011 को 5:59 pm

shikaji mujhe pta nhi tha is shehar ke bare me aap ne dikha diya he agar moka mila to jaroor dekhenge is shehar ko

janta ki khoj ने कहा… 11 सितंबर 2011 को 6:01 pm

aap ke bare me jitna janta hun utna h i kam lgta he

 
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