मैं दीपक शुक्ल सीतापुर (उत्तर प्रदेश) का रहने वाला हूँ . हालांकि मेरा पैतृक निवास  सीतापुर में है परन्तु मेरे पिता के सरकारी सेवारत होने के कारण  मेरा जन्म उत्तरांचल के जनपद पिथोरागढ़ में हुआ एवं मेरा लालन पालन उधमपुर (जम्मू कश्मीर) में हुआ है.  शैशव अवस्था जम्मू कश्मीर की उर्दू प्रभावित संस्कृति में व्यतीत करने के कारण अनजाने मेरी कविताओं में उर्दू का समावेश हो जाता है जिसे में यथासंभव दूर करने के लिए प्रयत्नशील रहता हूँ. कालांतर में योवानावस्था में मुझे लखनऊ के अदब एवं गंगा जमुनी संस्कृति  का ज्ञान हुआ जिसने मेरी गीतों, गजलों एवं शेरो शायरी लिखने पढ़ने में मेरी रूचि बढ़ाई.वर्तमान में मैं केन्द्र सरकार के एक विभाग में सेवारत हूँ जिसके कारण में करीब पूरे भारत का भ्रमण कर चूका हूँ जिसने मेरे अनुभव को व्यापक एवं परिपक्व किया है.  में अपनी कविताओं में सरलतम शब्दों का उपयोग के साथ यथासंभव लय-बद्ध करने की कोशिश करता हूँ जिससे कविता के भाव सभी आसानी से समझ सकें....साथ ही में कविताओं को पढ़ने का आनंद भी उठा सकें ....में यहाँ अपनी दो कवितायेँ  प्रस्तुत कर रहा हूँ जोकि आशा है आपको  पसंद आएँगी...


 
 
 
 
 
 
 
"माँ"

सबसे मधुर है माँ का रिश्ता...
प्रभु ने इसे बनाया है...
तेरे उपकारों से उर्रिन...
कोई न हो पाया है...

अपनी खुशियाँ वार दीं तुने...
मैंने जब मुस्काया है...
अपना सुख मैं तज न पाया...
जब दुःख तुझ पर आया है...

अक्षर ज्ञान कराया तुने...
मुझको बहुत पढाया है...
मैंने तुझको छोड़ के ऐ माँ...
लक्ष्मी को अपनाया है...

अपनी हर इच्छा को तुझसे...
हठ करके मनवाया है...
पर वादा गर किया जो तुझसे...
उसको नहीं निभाया है....

ऊँगली पकड़ के ऐ माँ न तुमने...
चलना मुझे सिखाया है...
पर मैंने न हाथ को  थामा  ..
जब भी मौका आया है...

ममता के आँचल को ऐ माँ...
तुने सदा ही छाया है...
कितना निष्ठुर हूँ मैं फ़िर भी...
मुझको गले लगाया है...

सब कुछ मैंने चाह तुझसे...
कुछ भी न लौटाया है...
पलकों पर फ़िर भी माँ तुमने...
मुझको सदा बिठाया है...

बिछुदा कभी जो मैं माँ तुमसे...
तुमने नीर बहाया है...
जाने कितनी बार हे ऐ माँ...
तेरे ह्रदय दुखाया है....

ईश्वर ने अपने होने का...
यह अहसास कराया है....
माँ के रूप मैं देखो तो...
वह ख़ुद धरती पर आया है....

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"वो भोली सी लड़की"

वो भोली सी लड़की,
वो प्यारी सी लड़की।
बड़ी खूबसूरत,
वो न्यारी सी लड़की॥

हम देखें उसे तो,
वो शर्माती रहती।
कहें कुछ जो उस से,
तो घबराती रहती॥

वो दामन संभाले,
नज़र को झुका के।
वो देखे नहीं हमको,
नज़रें उठा के॥

कोई जब भी बोले,
तभी बात करती।
मगर वो ...नहीं ,
सबके ही साथ करती॥

वो मीठी सी बोली
में बोली हमेशा।
मगर वो बहुत कम,
ही बोली हमेशा॥

कभी जो कहीं वो,
जरा मुस्कुराई।
लगा जैसे बदली,
गगन पे है छाई॥

हंसी जो कहीं वो,
किसी बात पर जो।
लगा जैसे सावन,
की बरसात आई॥

वो पलकें उठाये,
उठाकर गिराए।
बड़ी सादगी से,
वो दिल को चुराए॥

वो कजरारी आँखों में,
काजल अनोखा।
जिसे देख, हो साँझ का,
सबको धोखा॥

वो पहने गले में जो,
जो मोती की माला।
हर इक ख्वाब जैसे,
पिरोकर संभाला॥

जहाँ भी वो जाए,
फिजा गुनगुनाये।
महक से उसकी की,
समां महक सा जाये॥

वो सपनों में आके,
है हमको सताती।
वो दिन को सता के,
ही सपनों में आती॥

वो पहने है पाजेब,
छम-छम है करती,
मगर वो दबे पांव,
फिर भी है चलती॥

न जानूं की वो कबसे,
दिल में बसी है।
मैं जानूं वोही मेरे,
दिल में बसी है॥

वो भोली सी लड़की,
वो प्यारी सी लड़की।
बड़ी खूबसूरत,
वो न्यारी सी लड़की॥

दीपक शुक्ल...

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8 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… 28 मई 2010 को 11:31 am

दोनों कविताएँ प्रवाहमयी और सुन्दर

अरुणेश मिश्र ने कहा… 28 मई 2010 को 11:32 am

रचना भावपूर्ण ।

रश्मि प्रभा... ने कहा… 28 मई 2010 को 5:14 pm

बहुत ही अच्छी रचनाएँ

Ruma-power ने कहा… 28 मई 2010 को 5:42 pm

बहुत बढिया रचनाएँ...

shikha varshney ने कहा… 28 मई 2010 को 6:13 pm

एक कल्पना एक यथार्थ दोनों ही सुन्दर.

Kavita Rawat ने कहा… 28 मई 2010 को 6:24 pm

Bahut sundar rachnayne... aur photo bhi....

Himanshu Pandey ने कहा… 29 मई 2010 को 5:33 am

सहज सुन्दर रचनाएं ! आभार ।

Alpana Verma ने कहा… 30 मई 2010 को 9:24 am

दोनों ही रचनाएँ बहुत अच्छी लगीं दीपक जी.
'ईश्वर ने अपने होने का...
यह अहसास कराया है....
माँ के रूप मैं देखो तो...
वह ख़ुद धरती पर आया है....'
सच कहते हैं आप !
माँ 'कविता बहुत ही भावपूर्ण और प्रभावी है.
बधाई.

 
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