वसंत आर्य की दो गज़लें
(एक) हवा में घुला हुआ ये जहर क्यों है फरेब के जैसा मेरा शहर क्यों है भोला दीखता है उसके चहरे जैसा- हालात साजिशों की तरह मगर क्यों है फूल भी ...
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वसंत आर्य की दो गज़लें
(एक) हवा में घुला हुआ ये जहर क्यों है फरेब के जैसा मेरा शहर क्यों है भोला दीखता है उसके चहरे जैसा- हालात साजिशों की तरह मगर क्यों है फूल भी ...